हो रहा घनघोर युद्ध जब
दो श्रेष्ठ धनुर्धारियोंमे,
अस्त्र शस्त्र पारंगत थे दोनो
लढ रहे थे आवेश मे ।।
देख राधेयावेश उसदिन
माधवभी गहन विचारमे,
रुख मोड रथका माधव लाये
युद्धभूमी के एक छोर मे ।।
तभी फसा रथ का पैया
उतारा राधेय ऊसे निकालने,
बोला मै निशस्त्र हु माधव
पार्थ को रोको शर सांधने ।।
तभि माधवने कहा पार्थसे
राधेयका मस्तक साधने,
बोला कर्ण ये अधर्म है माधव
तिर चलाना निशस्त्र को मारने ।।
तभि माधव बोले छद्मसे
अब धर्म तुझे कैसे याद आया?
जब अधर्म हो रहा था
कहा था तुम्हारा धर्म राधेया ?
याद करो राधेया दुर्योधनने
वारणावतका जब षडयंत्र रचा,
सबकुछ जान,मौन रहे तुम
निष्पाप पांडवोको मिली सजा ।।
याद करो तुम राधेया
जब द्यूत सभा मे अधर्म हुवा,
पांडू कुलके कुलवधुका
चिरहरण दुःशासनने किया ।।
याद करो राधेया तुमने
पांचाली को जब वेश्या कहा,
छलसे हारेथे पांडव सबकुछ
अबला पांचालीने सबकुछ सहा ।।
जब बालक अभिमन्यू को
तुम सात महारथीयोने घेरा था,
एक नही सात रथीयो ने
उर एक वीर को मिलके मारा था ।।
छिन्न विछिन्न कर रहे थे तुम सब
उस युवा वीर के छाती को,
लहू लुहान था निशस्त्र बालक वो
हसके चुम रहा था माटी को ।।
धर्म के गर तुम सचमे
इतने बडे महाज्ञानी थे ?
जब घेर रहे थे निशस्त्र अभिमन्यू को
तब क्यो तुम ज्ञानके अज्ञानी थे ?
जीवनभर थी साथ तुम्हारी
अधर्म करने वालो को,
अधर्मका साथ देने वाले अधर्मी
मत छोडो पार्थ इन मतवालो को ।।
अधर्मी को मारना अधर्मसे
ये तो आपद धर्म है,
उठा गांडीव और चला तिर
पार्थ तेरा अब यही कर्म है ।।
पार्थ तेरा अब यही कर्म है ।।
शब्द
पराग पिंगळे
यवतमाळ
14 मार्च 2025
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